Famous Jasoos in Delhi

सारे दिल्ली शहर में 45  वर्ष के निजी जासूसी एजेंसी की काफी चर्चा थी। राज्य स्तर के कुछ बड़े आपराधिक मामलों को सुलझा लेने के बाद अब लोग कहने लगे थे कि वह तीक्ष्ण बुद्धि का, चुस्त एवं विलक्षण युवक है। अखबारों में भी प्रायः उसके बारे में कुछ न कुछ छपता ही रहता था।
अतः निजी डिटेक्टिव ने महाविद्यालय की शिक्षा के साथ-साथ ही बतौर प्राइवेट जासूस अपनी प्रैक्टिस आरंभ कर दी थी। उसने अपने घर  के सामने वाले हिस्से में बाकायदा एक दफ्तर भी बना लिया था। जहां पर  मुसीबत में फंसे लोग उससे सहायता लेने आते थे।

फिलहाल ‘फॉरेंसिक डिटेक्टिव एजेंसी ‘ के डाइरेक्टर श्री विजय आधे घंटे से उसके दफ्तर में बैठे उसका इंतजार कर रहे थे।

उनसे मिलने के लिए डिटेक्टिव भी कम्युनिटी सेंटर में चल रहे पुलिस समारोह को छोड़ कर आया था। डिटेक्टिव को सूचना मिली थी श्री विजय को उस से बहुत जरूरी काम है।

राकेश ने अपनी मोटर साइकिल दफ्तर के बरामदे में खड़ी की। सामने ही श्री विजय की कार खड़ी थी। गाड़ी के बगल से गुजरते हुए जासूस अपने दफ्तर में पहुंचा। कुमार साहब सोफे पर न बैठ कर बेसब्री से उसके दफ्तर में टहल रहे थे। कुमार  को देख कर वह उसकी ओर लपके।

दफ्तर में घुसते ही डिटेक्टिव बिना किसी औपचारिकता के बोला, “बताइए कुमार साहब, क्या जरूरी काम आ गया है? मुझे कम्युनिटी सेंटर में आप का सेक्रेटरी बुलाने गया था।”

“बेटा, मुझे दुख है कि मैंने तुम्हें अचानक ही तकलीफ दी। मैं 2 घंटे बाद ही विमान से एक सप्ताह के लिए अमेरिका जा रहा हूं। उससे पहले मैं तुम्हें एक महत्त्वपूर्ण केस देना चाहता हूं। हमारी कंपनी विभिन्न मशीनों में लगने वाले एक खास किस्म के बियरिंग बनाती है। ये बियरिंग बहुत महंगे होते हैं। पुलिस पिछली बार हुई चोरी  का पता लगा पाने में असफल रही है। बेटे, तुम इस केस को अपने हाथ में ले लो। मैं तुम्हें मुंहमांगी फीस दूंगा।”

“आप सिर्फ एक हजार रुपए अग्रिम तौर पर खर्चे के लिए दे दीजिए। आप का केस सुलझ जाने के बाद आप अपनी मरजी से जो इनाम देंगे, मैं ले लूंगा,” डिटेक्टिव  ने कहा।

“मंजूर है, तुम शाम को 4 बजे हमारी फैक्टरी में आ कर हमारे जनरल मैनेजर श्रीकांत से मिल लेना। मेरे अमेरिका जाने के बाद वही तुम्हारी मदद करेंगे।”

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